
BABA DAS PREM PAL JI
बाबा दास प्रेमपाल जी
बाबा दास प्रेमपाल जी का जन्म पंजाब राज्य के नवांशहर जिला जालन्धर में 15 अप्र्रैल, 1959 को हुआ था। गुरू नानक देव विश्वविद्यालय से बी.एस.सी., बी.एड. की डिग्री हांसिल की। आदर्श विश्वविद्यालय नवांशहर में गणित व विज्ञान के अध्यापक के रूप मे कार्यभार संभाला। उसके बाद जे.एस.यू.एफ.एच. खालसा सीनियर सैकेन्डरी विद्यालय नवांशहर में कार्य किया। शुरू से धार्मिक प्रवृति के थे पर सत्संग कीर्तन, गुरू साध -संगत से अंजान थे। विवाह पक्का होने पर ससुराल पक्ष ने इन्हें एक सत्संग के दोरान बाबा जी से मिलवाया। उनके द्वारा सत्संग में बोली गई पंक्तियाँ ‘प्रेम किया तिन ही प्रभ पायो’ इनके जहन में उतर गई। विवाह के बाद उनके साथ के एक सेवादार ने इन्हंे मिशन के विषय में गइराई से बताया व समझाया। जब महाराज चड़विन्दादास जी, जिन्हें उस वक्त बाबा बलवन्त सिंह जी के नाम से जाना जाता था, की डयूटी वहाँ सत्संग करने की लगी तब से ये उनकी शरण में आ गए। महाराज चड़विन्दादास जी में हुजूर महाराज के पूर्ण दर्शन होने के कारण ये इसी दरबार के होकर रह गए तथा निरन्तर यहाँ पर धाम के बड़े उत्सवों में मंच संचालक की डयूटी प्रेम व लग्न से करते रहे। इनकी प्रेम व लग्न को देखते हुए 16 फरवरी 2008 को दास धर्म स्थापना दिवस के भण्डारे पर तिलक कर बाबाजी की उपाधी से नवाजा, तब उन्होंने भी एकदम वहीं पंक्तियां बोली ‘‘जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो’’। जिन्होंने बाबाजी को अपने पुराने दिनों में वापिस मोड़ दिया। विदेशों में मिशन को फैलाने तथा सत्संग द्वारा लोगों को संदेश देने की डयूटी लगा दी साथ ही अपनी आजिविका अर्जित करने हेतु कनाडा की ही एक कम्पनी में कार्य कर रहे हैं। इनका महाराज जी व मिशन के प्रति इतना गहरा लगाव है कि उसी प्रेम रंग में रंगे गुरू प्रेम को जन जन के अंदर पैदा कने के लिए दिन-रात अथक परिश्रम कर रहे हैं तथा अपनी डयूटी बखूबी निभाते निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं।

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